शरीर के विभिन्न हिस्सों खासकर हथेलियों और पैरों के तलवों के महत्वपूरण बिन्दुओं पर दबाव डालकर विभिन्न रोगों का इलाज करने की विधि को एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्दति कहा जाता है | चिकित्सा शास्त्र की इस पद्दति का मानना है कि शरीर में हजारों नसों ,रक्त धमनियों ,मांसपेसियों ,स्नायू और हड्डियों के साथ कई अन्य चीजे मिलकर इस शरीर रूपी मशीन को चलाते है | अत : किसी बिंदु पर दबाव डालने से उससे सम्बंधित जुड़ा भाग प्रभावित होता है इस पद्दति के लगातार अध्ययनों के बाद मानव शरीर के दो हजार ऐसे बिंदु पहचाने गए है जिन्हें एक्यू पॉइंट कहा जाता है जिस एक्यू पॉइंट पर दबाव डालने से उसमे दर्द हो उसे बार बार दबाने से उस जगह से सम्बंधित बीमारी ठीक हो जाती है | इस पद्दति में हथेलियों ,पैरों के तलवों ,अँगुलियों और कभी कभी कोहनी अथवा घुटनों पर हल्के और मध्यम दबाव डालकर शरीर में स्थित उन उर्जा केन्द्रों को फिर से सक्रीय किया जाता है जो किसी कारण अवरुद्ध हो गई हों |

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एक्यूप्रेशर चिकित्सा का इतिहास

एक्यूप्रेशर चिकित्सा प्रणाली का इतिहास लगभग 5 हजार वर्ष पहले का बताया जाता है। इस चिकित्सा प्रणाली को विकसित करने में लगे विशेषज्ञों ने लगभग 100 वर्षो के अथक प्रयास के बाद मानव शरीर में लगभग 900 बिंदुओं को चिह्नित किया था, जिस पर दबाव डालकर हर तरह की बीमारियों का इलाज किया जाता था। बिहार के एक अन्य होम्योपैथिक चिकित्सा डा. चंद्रमा प्रसाद ने जागरूकता मिशन के जरिये 90 के दशक में इसे पुनस्र्थापित करने के साथ इसे जन-जन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया था। उन्हीं की पुण्यतिथि पर 26 मई को प्रत्येक वर्ष एक्यूप्रेशर दिवस का आयोजन किया जाता है। वहीं वर्ष 1979 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी चीन में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान एक्यूप्रेशर की एक कारगर चिकित्सा प्रणाली घोषित किया था। भारतीय समाज में मालिश करने की परंपरा को भी इस विधि से जोड़ कर देखा जाता है।

आखिर है क्या एक्यूप्रेशर

शरीर के खास बिंदुओं पर दबाव डालकर इलाज करने की विधि एक्यूप्रेशर को मर्म-दाब-चिकित्सा भी कहा जाता है। इसके जरिये रोगग्रस्त अंगों की जांच करने के बाद अंग से संबोधित बिंदुओं पर उंगली या नहीं चुभने वाली लकड़ी और लोहे के जिम्मी से दबाव डाला जाता है। इसके अलावे दबाव डालने हेतु बीज व चुंबक का भी इस्तेमाल किया जाता है। आरा शहर मे विगत तीन वर्षो से सैकड़ों मरीजों का सफल इलाज कर चूके डा. पी. पुष्कर के अनुसार अर्थराइटिस, स्पौंडिलाइटिस, सुनबहरी, लकवा, न्यूरोसीस चर्म रोग, मानसिक रोग, श्वास रोग, स्नायू रोग एवं पेट आदि से संबंधित बीमारियों का सरल एवं सफल इलाज संभव है।

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इस पद्धति का विकास चीन में होने के कारण इसे चीनी पद्धति के रूप में जाना जाता है। लेकिन इसकी उत्पत्ति को लेकर काफी विवाद भी हैं। एक ओर जहां चीन का इतिहास यह बताता है कि यह पद्धति 2000 वर्ष पहले चीन में विकसित होकर सारी दुनिया के सामने आई। वहीं, भारतीय मतों के अनुसार आयुर्वेद में 3000 ई.पू. ही एक्यूप्रेशर में वर्णित मर्मस्थलों का जिक्र किया जा चुका है। वर्तमान में भारत और चीन के साथ ही हांगकांग, अमरीका आदि देशों में भी कई रोगों के उपचार में एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति काम में लाई जाती है।

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