चाहे कैसा भी गले का रोग क्यों ना हो, इस चमत्कारी पेड़ की छाल से सब ठीक हो जाएगा

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  • यह कांटेदार पेड़ होता है। सम्पूर्ण भारत वर्ष में बबूल के लगाये हुए तथा जंगली पेड़ मिलते हैं। गर्मी के मौसम में इस पर पीले रंग के फूल गोलाकार गुच्छों में लगते है तथा सर्दी के मौसम में फलियां लगती है
  • बबूल पेड़ बड़े व घने होते हैं। ये कांटेदार होते हैं। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है। बबूल के पेड़ पानी के निकट तथा काली मिट्टी में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इनमें सफेद कांटे होते हैं जिनकी लम्बाई 1 सेमी से 3 सेमी तक होती है। इसके कांटे जोड़े के रूप में होते हैं।
  • इसके पत्ते आंवले के पत्ते की अपेक्षा अधिक छोटे और घने होते हैं। बबूल के तने मोटे होते हैं और छाल खुरदरी होती है। इसके फूल गोल, पीले और कम सुगंध वाले होते हैं तथा फलियां सफेद रंग की 7-8 इंच लम्बी होती हैं। इसके बीज गोल धूसर वर्ण (धूल के रंग का) तथा इनकी आकृति चपटी होती है।

याद रखे:

  • इसकी मात्रा काढ़े के रूप में 50 ग्राम से 100 ग्राम तक, गोंद के रूप में 5 से 10 ग्राम तक तथा चूर्ण के रूप में 3 से 6 ग्राम तक लेनी चाहिए।

कैसे करे इस्तमाल:

  • बबूल के पत्ते और छाल एवं बड़ की छाल सभी को बराबर मात्रा में मिलाकर 1 गिलास पानी में भिगो देते हैं। इस प्रकार तैयार हिम से कुल्ले करने से गले के रोग मिट जाते हैं।
  • बबूल के रस में कली का चूना मिलाकर चने के बराबर गोली बनाकर चूसने से सर्दी के कारण बैठा हुआ गला ठीक हो जाता है।
  • बबूल की छाल को पानी में डालकर उबालकर इस पानी से गरारे करने से गले की सूजन दूर हो जाती है।

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