मोटापे का अर्थ है – शरीर में चर्बी यानी वसा का ज्यादा मात्र में इकट्ठा हो जाना। चर्बी भी अजीब चीज है। अगर संतुलन में हो तो शरीर को सुडौल बनाए रखती है, काम हो तो आदमी बेडौल दिखता है और ज्यादा हो तो बेडौल ही क्या पूरा शरीर डावांडोल हो जाता है। अर्थात एक सीमा तक चर्बी जरूरी है, इसके बाद गैरजरूरी। जिसके शरीर में चर्बी संतुलित मात्रा में है, उसके लिए तो चिंता की कोई बात नहीं है, परन्तु जिसके शरीर में चर्बी की मात्र काम है, वे चर्बी बढ़ाने के लिए और जिनके शरीर में चर्बी की मात्रा ज्यादा है, वो इसे घटाने के लिए परेशान दिखते हैं। एक अध्याय में हम चर्बी बढ़ाने अर्थात मोटापे के समस्या से निजात पाने लिए चर्चा करेंगे।

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मोटापे की समस्या की जैविक कारणों पर तमाम वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध हैं, पर यहाँ उनकी गंभीर चर्चा बहुत जरूरी नहीं दीखती क्यूंकि यह लेख जनसाधारण को ध्यान में रखकर लिखा जा रहा है। अलबत्ता, मोटापे की समस्या के कुछ मोटे मोटे पहलू जान लेना तो उपयोगी है ही।

दरअसल मोटापे की समस्या मुख्य रूप से एक या दो  तरह से पैसा होती है। कुछ लोगो में मोटापा वंशगत प्रभाव  से होता है या शरीर की अंदरूनी मशीनरी ऐसी होती है कि वो जो कुछ खाते हैं उसका ज्यादा हिस्सा चर्बी में तब्दील हो जाता है। यानी एक वर्ग ऐसा है जिसके शरीर में चर्बी जमा करने की ख़ास प्रवृत्ति होती है। ऐसे लोगों को  अपने स्वाथ्य के प्रति हमेशा चौकन्ना रहने की जरूरत होती है। मोटापा का दूसरा और सबसे व्यापक कारण है लापरवाही भरी दिनचर्या। जरूरत से ज्यादा और सारे दिन कुछ न कुछ खाते रहने, आलस्य भरा और श्रमहीन जीवन बताने, भोजन की बाद दिन में सोने, ताली-भुनी, वसायुक्त चीजों का ज्यादा सेवन करने जैसी आहार-विहार की लापरवाहियों के वजह से ज्यादातर लोग मोटापे के शिकार बनते हैं। एक सवाल यह है की आखिर किस स्थिति को हम मोटापा कहेंगे? तो इसका सामान्य सा उत्तर यह है की जब तक शरीर में चुस्ती-फुर्ती कायम है और मन में उत्साह उमंग बना हुआ है, तब तक मोटापे या दुबलेपन जैसी कोई समस्या नहीं है। यूं सामान्यतः जितने इंच शरीर की लम्बाई हो लगभग उतने किलो शरीर का वजन हो तो इससे संतुलित स्थिति मानी जाती है। इसमें उन्नीस-बीस का फर्क से कोई ख़ास अंतर नहीं पड़ता लेकिन जब फर्क ज्यादा बढ़ने लगे तो समझिए की सावधान होने का समय आ गया है। जिन बुजुर्गों का वजन, ३०-३५ वर्ष की उनकी स्वस्थ अवस्था जितना आज भी बना हुआ है, वो अपने तो अच्छे स्थिति में मान सकते है।

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मोटापे का आक्रमण अक्सर सबसे पहले पेट, कमर, कूल्हों, और जांघ पर होता है। इसके बाद गर्दन, चेहरा, हाथ-पैर व शरीर की शेष अंग इसकी गिरफ्त में आ जाते है। ध्यान रखने वाली बात है की शुरुवाती दौर में, या जब तक मोटापा पेट, कमर, कूल्हों, और जांघों तक सीमित रहता है तब तक इसे दूर करना ज्यादा आसान होता है।  लेकिन जब पूरे शरीर पर मोटापा अपना मजबूत कब्ज़ा जमा लेता है तो इसे  हटा पाना तकलीफदेह और मशक्कत भरा काम हो जाता है।

खैर, स्थिति जो भी हो, अगर मोटापा से ग्रस्त लोग अपने स्वस्थ्य और सौंदर्य वापस लाना चाहते हैं तो उन्हें अविलंब सकल्प की मजबूती की साथ कमर कस कर कुछ उपायों पर अमल करने की तयारी कर लेनी चाहिए अन्यथा भविष्य की देहरी पर मधुमेह,हाई ब्लड प्रेशर, कब्ज, गैस, हृदय रोग, दम, गठिया, आदि अन्यान्य रोग उनका स्वागत करने को तैयार मिलेंगे, यह तथ्य जान लें।

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वैसे मोटापे से त्रस्त लोग इससे निजात पाने के लिए जाने क्या क्या करते हैं और कहाँ-कहाँ भटकते हैं, पर ज्यादातर ऐसा ही होता है की मोटापा अंतिम दम तक साथ नहीं छोड़ता। यह भी गौतलब है की मोटापे के इलाज के चक्कर में अक्सर लोग ज्यादा खतरनाक बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। ऐसे में सीधी सी बात यह है की मोटापा दूर करने का कार्यक्रम बहुत सोच समझकर बनाएं और मुस्तैदी से उसका पालन करें। दवाओं का सहारा लेने का इरादा हो तो इतना याद रखें के एलोपैथी में मोटापा घटाने की अब तक जो भी दवाएं है, निरापद कतई नहीं है। इन दवाओं  से आप ज्यादा बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा से अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। आयुर्वेद के तमाम नुस्खे  निरापद और कारगर हो सकते हैं, पर इनमे भी हर किसी नुस्खे को सिर्फ जड़ी-बूटियों के नाम पर ही आँख मूँद कर नहीं आजमाया जा सकता। पथ्य-अपथ्य का ध्यान रखते हुए होमियोपैथी और बायोकैमी दवाओं से वजन घटाना पूरी तरह सुरक्षित माना जा सकता है। कई लोग सोच सकते हैं कि स्वदेशी चिकित्सा की बात करते करते होम्योपैथी का जिक्र कैसे? तो यहाँ अति संछेप में यह बता देना उचित होगा की होम्योपैथी के सिद्धांत और आयुर्वेद की मूल मान्यताओं में कही कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि कई मायनो में होम्योपैथी कहीं ज्यादा “आयुर्वेदिक पद्यति” है। यह रहस्य वे लोग आसानी से समझ सकते है जिन्हे होम्योपैथी की सिद्धांत की बारे में अच्छी समझ है। यह भी आश्चर्यजनक बात है की जर्मनी में खोजी गए यह पद्यति भारतीय समाज और सांस्कृतिक मूल्यों के सर्वथा अनुकूल है। ऐसी पद्यति की खोज संभवतः इसलिए भी आसान हुई, क्यूकि इसके आविष्कर्ता महात्मा हनीमेंन का जीवन भारतीय ऋषियों-महात्माओं जैसा अध्यात्म प्रेरित नैतिकवादी रहा।

बहरहाल, मोटापा घटाने के लिए आप कुछ भी करें, अंततः आहार-विहार संयमित करने से ही बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। इसमें से पहले आहार की बात की जाए और इसका सीधा सा अर्थ यह है  की आपको अपना खान पान ऐसा संयोजित करना पड़ेगा की शरीर को बाहर से वासा और ऊर्जामान (कैलोरी) की आपूर्ति कम से कम हो। चुकी वसा शरीर के लिए ऊर्जा का स्रोत है, इसलिए बहार से कम वसा और कम कैलोरी पहुंचेगी तो शरीर में ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करने के लिए अंदर जमा चर्बी अपघटित होकर शरीर के काम आने लगेगी और इस तरह मोटापा कम होना शुरू हो जाएगा। आजकल प्रचलित “डाइटिंग” का यह तरीका काफी नुकसानदेह हो सकता है और इससे आप शक्तिहीनता और कई दूसरी बीमारियों के शिकार हो सकते हैं।

दरअसल आहार को काम करने के बजाय उसे संतुलित करने की जरूरत है।भोजन में ऐसी चीजें शामिल करनी चाहिए को काम वसायुक्त हों और जिनका ऊर्जामान (कैलोरी) काम हो, परन्तु वे शरीर के लिए जरुरी पोषकता की पूर्ती करने वाले हों।

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आहार संतुलन के बाद विहार में भी संतुलन जरूरी है। अर्थात पूरे दिन में से कुछ समय आपको शारीरिक श्रम के लिए अवश्य निकालना चहिये। जितना ऊर्जा शरीर को भोजन से मिलती है अगर उससे ज्यादा श्रम में खर्च होती है तो समझ लीजिये मोटे लोगो को सार्थक परिणाम मिल सकते है। आहार विहार को संतुलित करते हुए मोटापा घटाने का फिलहाल एक कार्यक्रम दिया जा रहा है, मोटे लोग इसे अपनाएं और लाभ उठाएं

  1. ६-७ घंटे की पर्याप्त नींद लेने की बाद सवेरे जल्दी उठने की आदत डालें। उठने की बाद सबसे पहले १ गिलास गुनगुने पानी में २ चम्मच नीम्बू का रास और २ चम्मच शहद मिलाकर गटागट पी जाएं। अब कुछ दिन टहलने के बाद शौच के लिए जाएं।
  2. शौचादि से निवृत्त होकर काम से काम ३-४ किलोमीटर तेज क़दमों से टहलने निकलें, हो सके तो थोड़ी दौड़ भी लगाएं। याद रखें धीरे धीरे चहलकदमी करने से मोटापे पर कोई असर नए पड़ने वाला। टहलने की बजे चाहें तो केवल आसान व्यायाम से भी काम चला सकते हैं। आसनों में सूर्यनमस्कार, उत्तान पादासन, हलासन, धनुरासन, जानुशिरासन,वक्रासन, ताड़ासन, पश्चिमोत्तानासन, भुजंगासन, पवनमुक्तासन, में से पहले आसान आसनों से शुरुवात करके धीरे धीरे जितना आसान करें, करें। उड्डीयान बांध तथा भस्त्रिका प्राणायाम भी करें। आसान-व्यायाम फुर्सत हो तो सवेरे शाम दोनों समय खाली पेट कर सकते है; और बेहतर परिणाम मिलेंगे। इतना अवश्य समझ लें की आसान-व्यायाम योग्य व्यक्ति से सीख समझकर ही शुरू करना चहिये।
  3. नाश्ता हल्का फुल्का करें। कोई एक किस्म का एक पाँव फल या फल का रास लें। ५० ग्राम मूंग में थोड़ा गेहूं, थोड़ी मेथी मिलाकर अंकुरित करके सेंधा नमक और नीम्बू का रास मिलाकर भी नाश्ते के रूप में सेवन कर सकते हैं। दूध पीते हो तो मलाई उतारकर एक पाँव दूध में आधा चम्मच सौंठ तथा ६-७ मुनक्का या थोड़ा अंजीर डालकर उबालें और गुनगुना रहने तक पियें। चाय पीने का इरादा हो तो अदरक या सौंठ, तुलसी, काली मिर्च, लौंग, इलायची, मुलहठी आदि जड़ी बूटियों की चाय इस्तेमाल कर सकते है। इस तरह की आयुर्वेदिक चाय गुरुकुल कांगड़ी, गायत्री परिवार आदि आश्रमों बनी हुई मिलती है।
  4. मोटापे से ग्रस्त लोगों को दोपहर और शाम के भोजन में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। घी, तेल से बनी हुई वसायुक्त और ज्यादा प्रोटीन व कार्बोज युक्त  चीजों का सेवन हर हाल में सीमित कर देना चहिये।  भोजन से पहले पर्याप्त मात्र में सलाड खाएं। हरी सब्जियां की मात्रा भरपूण रखें और गेहूं की रोटी काम खाएं। अगर मोटापे के समय ज्याद हो तो काम से काम, एक माह के लिए रोटी खाना एक दम बंद कर दें। एक दौरान जौ की आते की बनी रोटी भोजन में लें, या साबुत चने में जौ मिलाकर पिसवा लें। एक आटें की रोटी स्वादिस्ट भी लगेगी। १० किलो चना हो तो दो किलो जौ मिलाएं तो अच्छा लाभ मिलेगा। दालों में छिलकायुक्त मूंग, मसूर का सेवन बेहतर रहेगा।

चिकित्सा के शुरू में यदि एकाध हफ्ते तक सिर्फ मौसमी फल, फलों के रस, सलाद और हरी सब्जी व दाल पर ही निर्वाह करें तो अच्छा है। इसके बाद धीरे धीरे जौ की रोटी सेवन करना शुरू करें। एक डेढ़ महीने बाद गेहूं की रोटी खाना शुरू कर सकते है। दोनों समय का भोजन इसी तरह का करें। शाम को सोने से दो-तीन घंटे पूर्व भोजन कर लेना हितकर है। कब्जियत दूर करने के लिए एनिमा ले सकते है या सोने से पूर्व एक गिलास गुनगुने पानी के साथ एक चम्मच त्रिफला चूर्ण इसी मात्रा में इसबगोल में मिलाकर सेवन करें तो अच्छा होगा। त्रिफला की स्थान पर आवलें का चूर्ण भी ले सकते है। वैसे भी भोजन आदि के साथ ताजा या सूखे आवलें का चूर्ण, जो भी मिले, अवश्य सेवन करें।

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दोपहर की भोजन के साथ मलाई रहित दूध से जमाई दही या छाछ भी ले सकते है। इससे मोटापा घटाने में मदत मिलेगी। भोजन में यह पूरा सुधार अपनाते हुए इतना याद रखें की शुरुवात में एक हफ्ते तक फल-सब्जियां पर निर्वाह करने की बाद अचानक ही ढेर सारी रोटियां न खाया शुरू कर दें। एक-दो रोटी से शुरू करके धीरे धीरे रोटियों की संख्या यथोचित मात्रा में बढ़ाएं।

मोटापा, खासतौर पर पेट और कमर का, घटने के लिए एक अच्छा प्रयोग यह है की दोनों समय भोजन के तुरंत बाद आधा गिलास उबला हुआ गर्म पानी चाय के तरह इतना गर्म पी सकें, पी जाएं। यह प्रयोग डेढ़ दो माह तक कर सकते है। इसे बहुत लम्बे समय तक नहीं चलना चाहिए। यह प्रयोग प्रसव के बाद महिलाओं के पेट बढ़ने की समस्या में विशेष लाभप्रद है। गठिया, कब्ज, गैस, यकृत रोग, मासिक धर्म की अनियमितता, आँखों के नीचे कालेपन आदि में भी गर्म पानी का प्रयोग काफी हितकर है।

दोपहर और शाम की भोजन में ८-९ घंटे का अंतराल हो तो बीच में ३-४ बजे तक कोई हल्का पेय या फल लें। थोड़े भुने चने के साथ थोड़ी आयुर्वेदिक चाय लेकर भी काम चला सकते है।

इतने उपायों पर अमल करते हुए आप कुछ दिनों में मोटापे की समस्या पर तो वजय पा ही जाएंगे, आपके पोर पोर में स्फूर्ति का भी संचार होगा।

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मोटापा घटाने में सहायक कुछ अन्य नुस्खे

  1. १ गिलास पानी में ४ बड़े चम्मच भर सिरका खाली पेट सेवन करते रहने से कमर का मोटापा दूर होता है।
  2. कुलथों को पकाकर खाने से शरीर की चर्बी घटती है।
  3. सायंकाल के समय ६ माशा त्रिफला कोरे मिटटी की पात्रा में लगभग छटांक भर जल में भेजो दें। प्रातः काल मसल छानकर तथा एक तोला शहद मिलाकर नियमित पियें।
  4. पेट, कमर, व कुल्हो की चर्बी काम करने के लिए भांप सेंक करना चाहिए। यदि प्राकृतिक चिकित्सालय आदि में व्यवस्था न हो तो यह उपाए आप घर में भी कर सकते है। इसके लिए एक बड़े भगोने या पतीली में एक चम्मच नमक तथा तीन-चार चम्मच अजवाइन डालकर पानी भर दें। बर्तन पर जाली या चलनी आदि रख के पानी को उबालें। जब भाप उठने लगे तो दो छोटे तौलिये ठन्डे पानी में भिगोकर निचोड़ लें तथा बारी बारी से रखकर भाप से गर्म करके पेट, कमर, तथा कुल्हो को सेंक करें। इस उपाए से धीरे धीरे चर्बी छटने लगती है।
  5. प्रातः शौच जाने से पूर्व एक गिलास ठन्डे पानी में शहद मिलाकर नियमित कुछ दिनों तक पीने से चर्बी काम होने लगती है।
  6. तुलसी की पत्तों के रस में शहद मिलाकर नियमित चाटते रहने से चर्बी कम होती है।
  7. १ टोला मूली चूर्ण इतने ही शहद में मिलाकर पानी के साथ सेवन करने से चर्बी छटती है।
  8. बड़ी हरड़, अवलां तथा बहेड़े का छिलका (त्रिफला) सामान मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर इसमें से १ तोला चूर्ण शहद के साथ मिले पानी के साथ सेवन करने से ४० दिनों में मोटापा काम होने लगता है।
  9. त्रिफला व गिलोय की काढ़े में २५० मिली ग्राम लौह भस्म मिलाकर पीने से मोटापा बढ़ना रुक जाता है।
  10. १२ ग्राम शहद में ३ ग्राम चित्रकमूल का चूर्ण मिलाकर चाटने से पेट बढ़ना रुक जाता है।
  11. १ तोला गिलोय, ३ तोला बायबिडंग, २ तोला छोटी इलाइची, ४ तोला इन्द्रजौ, ढाई तोला बहेड़ा, ५ तोला बड़ी हरड़, ७ तोला ऑवला तथा ८ तोला शुद्ध गुग्गुल लें। गुग्गुल के अलावा पहले शेष कभी चीजों का चूर्ण बनाएं, इसके बाद गुग्गुल में मिलाकर अच्छी तरह से कूट लें। आधा से १ तोला यह चूर्ण शहद में मिलाकर सवेरे शाम पानी के साथ सेवन करने से मोटापा काम होता है। इसके साथ पथ्य अपथ्य का विशेष ध्यान रखें तो जल्दी सफलता मिलेगी।
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